शुद्ध बकैती
Blog of Mukund Madhav Mishra
Friday, 18 November 2011
आइना
एक आइना, कलम, दो सुफे लेकर बैठा
खुद को देखा, एक तस्वीर बनायीं
लगा सोचने,
तस्वीर देखकर
खूबसूरती मुझमे कहा से आई
कल
जिसके आंसू पोछे थे, अपने रेशमी रुमाल से
मेरे अक्स में मुसकुराती है, आज वोही बूढी माई
Saturday, 5 November 2011
वो बेपरदा भी होते हैं तो तेह्जीब् होती है,
हमारा नज़रे तक उठाना फिर बेहयाई क्यूं है
कहते हैं इंसानियत में अल्लाह बसा करता है
हैवानियत के साथ खड़ी पूरी खुदाई क्यूं है
मैंने कसर न छोड़ी जिनका साथ निभाने में
हिस्से मेरे आती उनकी बेवफाई क्यूं है
झूठे और मक्कारों की जिस जहाँ में मौज होती है
ऐसे शहर में माधव तेरी, फितरत सच्चाई क्यूं है.
मेहक
उधर की और से आती, हवा में एक खुशबू है,
कोई निकला है अब घर से, किसी ने ज़ुल्फ़ है झटकी
कि जिसके नाम से रौनक, हर इक मुंडेर पे होती
गुज़रती रोज़ इस रस्ते, वोही लड़की लिए मटकी
लो आया एक दिन ज़ालिम, दिया कर काम कुछ ऐसा
बड़ी नाजुक सी गागर थी, जो उसने जोर से पटकी
गयी मुंडेर कि रौनक, हवा भी आज रूखी है
खड़े खामोश अब रस्ते, है सूनी राह पनघट की
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