उर्दू में नेकी कहें, हिंदी में भलाई या फिर अंग्रेजी में चैरिटी, इन शब्दों का हर धर्म, सम्प्रदाय और सभ्यता में विशेष महत्त्व रहा है। कोई भी धार्मिक ग्रंथ उठा लीजिये या 'विक्रम-बेताल', 'सिंहासन बत्तीसी' और 'पंचतंत्र की कहानियां' जैसा कोई दन्तकथा संग्रह ले लीजिये, बुरे चरित्र या खलनायक को नायक के चरित्र से कुछ अलग करता है तो वो है उसकी नेकी। और दूर क्यों जाते हैं, राजामौली की कीर्तिमान स्थापित करने वाली फिल्म बाहुबली का नायक भी अपनी नेकी के कारण राजगद्दी का अधिकारी माना गया है। व्यक्तिगत लाभ को भुला कर समाज के विषय मे सोचने वालों को श्रेष्ठ स्थान देने का गुरुजनों का निर्णय इस बात को ध्यान में रखते हुए दिया जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज के बिना एकल का कोई अस्तित्त्व नहीं होता, और दूरदर्शी इस बात को भली भांति जानते हैं। नेक होने का दावा या दिखावा अपने अपने स्तर पर हर कोई कर लेता है। लेकिन आज से कुछ समय पहले तक भलाई के काम अलग अलग समीकरणों से तय होते थे, क्योंकि हर किसी की अपनी गणना होती है और उस गणना के अनुसार हर भले काम के बदले कुछ पा सकने की अपेक्षा। न जाने कितने तरह के फलों का लालच देने के बाद ही कोई " कर्म कर, फल की इच्छा मत कर " जैसे सुवचन सुनाता है। लेकिन कौन सा तपका सबसे ज्यादा नेकी करता था या कर पाता था? आर्थिक आधार पर समाज के बंटवारे को देखें तो मध्यम वर्ग का विचित्र प्राणी सबसे ज्यादा नेक होते हुए भी नेकी नहीं कर पाता था। जहाँ ग़रीब का सारा पुरुषार्थ दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए होता है, अमीर के पास खाने की टेबल पर सब कुछ होता है, भूख के सिवा। इन दोनों किनारों के बीच अटका हुआ हमारा मध्यम वर्ग, न सिर्फ दो वक्त की रोटी का इंतजाम करके चलता है बल्कि सप्ताह में एक बार की बोटी, या शाकाहारी है तो पनीर, भी उसके मेनु में होती है। ये सप्ताह में एक बार का पनीर माध्यम वर्गीय के लिए दो वक्त की रोटी से भी ज्यादा मायने रखता है। उसे पता है कि इससे ज्यादा कुछ कर पाता तो अभी तक बिल गेट्स बन चुका होता। लेकिन इससे कम में समझौता भी उसे मंजूर नहीं। ग़रीब का क्या है, वो तो एक दिन और भूखा रह लेता है और अपने साथी की मदद कर देता है, या एक डिनर के बदले मंदिर में चढ़ावा चढ़ा देता है, क्योंकि इहलोक की भूख की पीड़ा को वो परलोक में साथ नहीं ले जाना चाहता। वहीं उच्च वर्ग के महानुभावों के पास जायज़-नाजायज़ तरीक़े से कमाए धन की कोई कमी नहीं होती। कभी अपने पापों को कटवाने के लिए, तो कभी इनकम टैक्स विभाग को चकमा देने के लिए, अमीर का पैसा चैरिटी में लगता ही रहता है। और अगर इनमें से भी कोई वजह नहीं है, तो भी अहम की पुष्टि करने के लिए, खुद को श्रेष्ठ एवं ईश्वर तुल्य दिखाने के लिए भी धनवान पैसे तो खर्च करेगा ही। धनवान की नेकी मंदिरों में 11 रुपये का प्रसाद नहीं चढ़ाती, बल्कि आलीशान मंदिर ही बनवा देती है। उस मंदिर के ईश्वर में खुद को पूजा जाता देखने का भ्रम किसी भी दूसरे नशे से अधिक मादक होता है। वर्ना निदा फ़ाज़ली यूं ही नहीं कहते
बच्चा बोला देखकर, मस्जिद आलीशान
अल्लाह तेरे एक को, इतना बड़ा मकान ?
अब वापस आते हैं अपने मध्यम वर्गीय के पास। अगर वो अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करने लगे तो उसके पनीर का बजट डगमगा जाता है, और बिना कुछ खर्च किये किसी की श्रम से या फ़िर केवल मौखिक सहायता करने का समय भी निकलता है तो घर पहुंचने में देर हो जाएगी, और पनीर ठंडा हो जाएगा, चिकन बेस्वाद हो जाएगा। न जाने क्यूँ, ईश्वर ने इस बेचारे मध्यम वर्गीय को अमीर नहीं बनाया। वो भी अपने भले मन से खूब भलाई करता। ईश्वर और तकदीर के सिर पर चुपचाप अपना ठीकरा फोड़ते हुए ये भला मानस बोटियां तोड़ने में मशरूफ हो जाता है। ये सिलसिला आज से 15 साल पहले तक यूं ही चलता रहा। दुनिया में आई इंटरनेट क्रांति भी हमारे भले मानस के लिए कुछ नहीं लेकर आई। बस बेरोजगार बेटे को नए कंप्यूटर कोर्स कराने की जिम्मेदारी बढ़ गयी। और तब मध्यम वर्ग के लिए जादू का पिटारा लेकर आया अपना ज़ुकरबर्गवा। अरे वही फेसबुक वाला! फेसबुक के आने से मध्यम वर्ग के पास नेकी करने के शॉर्टकट आ गए। बस एक क्लिक और काम खत्म। पनीर की कुर्बानी दिए बिना एक से बढ़कर एक भलाई के काम हो जाते हैं इस फेसबुक पर-- " हींग लगे ना फिटकरी, रंग भी चोखा होय "। देखिये न, किसी बीमार बच्ची के दिल में छेद हो तो प्रति लाइक या शेयर पर कुछ पैसे उस बच्ची के इलाज के लिए मार्क जुकरबर्ग देते हैं। हम तो भलाई के ठेकेदार हैं, लाइक और शेयर दोनों कर देते हैं ताकि बच्ची को दोगुना पैसे मिलें। अपने पास से एक ढेला खर्च नहीं हुआ और वहाँ किसी का मुफ्त में इलाज हो गया। इससे अच्छा शॉर्टकट क्या हो सकता था। और तो और, यहाँ पुण्य कमाने के भी शॉर्टकट मौजूद हैं। बजरंग बली या साईं बाबा की बहुत सी ऐसी तस्वीरें लोगों ने डाल रखी हैं जिनको लाइक या शेयर करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। जो भी पहली बार ऐसी किसी तस्वीर को डालता है उसके पास बजरंग बली नें स्वयं स्वप्न में आकर इस बात की पुष्टि की होती है, इसलिए शंका का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इसी तरह बैठे बिठाए फेसबुक के एक शेयर से किसी खोये हुए बच्चे को चुटकियों में ढूंढ लिया जाता है। मुझे याद है बचपन में छोटी बहन रास्ता भटक गई थी तब पूरे गांव के लोग खोजने में जुट गए थे। तब फेसबुक नहीं था ना। अब तो फेसबुक पर भलाई करने की ऐसी आदत हो गयी है कि 5 मिनट के एक सेशन में कम से कम 10 भले काम करने होते हैं। 2010 में एक चार साल का बच्चा गुम हो गया था जो 3 दिन बाद ही माँ-बाप को वापस मिल गया। लेकिन उन तीन दिनों में ही किसी शुभचिंतक टेक-सेवी ने फेसबुक पर बच्चे के गुम होने की पोस्ट बना कर डाल दी। सुना है पिछले साल वो बच्चा 11 का हुआ तो अपना फेसबुक प्रोफाइल बनाने के बाद सबसे पहली नेकी के तौर पर उसने खुद के ही गुम होने वाली पोस्ट शेयर की। शॉर्टकट में नेकी करने वालों ने उस पोस्ट को तबतक ज़िंदा रखा था। क्या करें, यहाँ भी प्रतियोगिता इतनी बढ़ गयी है कि गुमशुदा की पोस्ट कम पड़ती हैं।
फेसबुक पर सबकुछ ठीक ही चल रहा था लेकिन वो मज़ा नहीं आ पा रहा था। एक बार फेसबुक लॉगिन करो तो ऊपर से नीचे तक स्क्रॉल के दौरान कुछ ऐसी भी पोस्ट नज़र आ जाती थीं जिनमें दिमाग़ी कसरत करनी पड़ती थी। तर्कों को आधार बनाकर आंकड़ो के साथ कुछ भी संजीदा लिखा हो तो उसे समझने में कितनी मेहनत करनी पड़ती है। इस सब में भलाई का काम तो मार खा रहा था। सोचने-समझने और तर्क करने जितनी ऊर्जा कहाँ बची होती है दो रोटी और एक चिकन का इंतजाम करने के बाद। फिर आया तारणहार, नेकी करने वालों के लिये रामबाण। इसका नाम लोगों ने व्हाट्सएप दिया था। यहाँ आने से पहले आप अपना दिमाग़ ताले में बंद करके आ सकते हैं। और फिर नेकी तो दिल से होती है।इसमें दिमाग़ का क्या काम! यहाँ विकल्पों की कोई कमी नहीं है। व्हाट्सएप पर भगवान श्रीकृष्ण की 20 मेगापिक्सेल के DSLR से खींची हुई फ़ोटो से लेकर अश्वत्थामा विरचित गीता तक, कैंसर को जड़ से मिटा सकने वाले घरेलू नुस्खे से लेकर दुनिया के सबसे बड़े हृदय विशेषज्ञ की सलाह तक और मुफ्त में 50000 रुपये कमाने के मौके से लेकर बाबा बड़बोलानंद के आशीर्वाद तक सब कुछ सहज उपलब्ध है। ये थोड़े से लालची, थोड़े अलसी पर बहुत ही नेकदिल वाले माध्यम वर्ग के लिए बिलकुल उपर्युक्त साधन सिद्ध हुआ। व्हाट्सएप एक ऐसा शॉर्टकट है जिससे अपनी डिनर टेबल पर बैठा हुआ एक औसत मध्यम वर्गीय दिन भर की नेकी का कोटा पूरा कर लेता है। आपाधापी वाले जीवन में सत्य की परख करने का समय किसके पास है! बस ये नेकी वाले संदेश एक फोन से दूसरे फोन, एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप में भेजे जाते रहते हैं। इन्हें भेजने वाले वो हैं जो होमियोपपैथी में विश्वास रखते हैं। दवा खा लो, फायदा नहीं तो कोई नुकसान भी नहीं होगा। वैसे ही, मैसेज भेज दो, फायदा नहीं तो कोई नुकसान भी नहीं है। एक बटन दबाने से अगर भलाई करने की अपनी सारी भड़ास निकल जाती है तो हर्ज़ ही क्या है? कम से कम व्हाट्सएप की आभासी दुनिया बाहर की दुनिया जितनी क्रूर नहीं है, झूठी ही सही, बनावटी ही सही, यहाँ नेकी ज़िंदा है। ये आभासी दुनिया एक संघर्षरत मध्यम वर्गीय के पनीर की थाली में चुपके से डोपामाइन या आनंद के हॉर्मोन का छौंक लगा देती है और यही डोपामाइन बेच कर ज़ुकरबर्ग दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शुमार हो गए। पर हम जिसे शॉर्टकट समझते हैं वो एक छलावा होता है, या एक झूठी आस, उनके लिए जो कठिन लंबे रास्ते पर या तो चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते या कुछ दूर चल कर थक चुके होते हैं। सवा रुपये के प्रसाद से ईश्वर को पा लेने की आस है शॉर्टकट, एक चूरण खाकर मृत्यु पर विजय पा लेने की उम्मीद है शॉर्टकट, बेरोजगारी से जूझते युवा के लिए शहर में अपना बंगला बना सकने के दिवास्वप्न हैं शॉर्टकट। लेकिन असल ज़िंदगी में शॉर्टकट नहीं हुआ करते, न सफलता के, न सम्पन्नता के और न ही नेकी के।