शुद्ध बकैती
Blog of Mukund Madhav Mishra
Tuesday, 14 February 2012
सब ज्ञानी बैठे सिंहासन, थी जिनको प्रभु किरपा की आस |
मैं मूढमति कुछ न समझा, जा बैठा हरि चरणों के पास ||
ना ज्ञानीजन ना सिंहासन, कुछ आये ना भगवन को रास |
आकर के मुझको अंक लिया, बुझ गयी मूर्ख के हिय की प्यास||
Saturday, 4 February 2012
निर्धन की भी हैसियत,मंगतों की भी साख
देखो तो इंसान को, लेकर मेरी आँख |
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