लक्ष्मण रेखा तुम गंगा सी,
मैं जल में जल कर पिघल गया।
ना राख बची ना अस्थि पिंड,
कर्पूर सरीखा सब जल गया।
जो शेष बचा वह श्याम धूम्र,
काजल बन कर थम जाऊँगा।
माना काला कलंक सा हूँ,
नैनों में पर सज पाऊँगा।
विरहा ही मेरी नियति किंतु,
आंसू संग बह मिट जाऊँगा।।