Thursday, 4 March 2021

काजल

लक्ष्मण रेखा तुम गंगा सी,

मैं जल में जल कर पिघल गया।

ना राख बची ना अस्थि पिंड,

कर्पूर सरीखा सब जल गया।

जो शेष बचा वह श्याम धूम्र,

काजल बन कर थम जाऊँगा।

माना काला कलंक सा हूँ,

नैनों में पर सज पाऊँगा।

विरहा ही मेरी नियति किंतु,

आंसू संग बह मिट जाऊँगा।।

बिखर गया हूँ शहर में, किसी बाजार की तरह सभी टटोल कर जाते हैं, खरीदार की तरह। मुझे कोई रोग नहीं है, हकीम जी भी कहते हैं, न जाने क्यूँ फिरा करता हूँ, फिर बीमार की तरह। जहां में बन मसीह फिरूँ, तो भी क्या हासिल मुझे आईना घूरता है, गुनहगार की तरह। अभी बाक़ी है हिकायत का मुक़म्मल होना कोई किरदार मरेगा, मिरे किरदार की तरह। फिर से यूँ रूठ कर जाना, नई कोई बात नहीं है मगर लौटे नहीं इस बार, तुम हर बार की तरह।