अंधेरे में टिमटिमाता सा चराग़ तो है, मेरी हैसियत छोटी सही, बेदाग़ तो है। रखो तुम अपने ठंडे बल्बों की रोशनी को मेरे दिये में चमक कम सही, आग तो है।।
Thursday, 29 June 2017
कुआँ कहीं का हो, पानी को पानी कहलाने दो, किसानों की मौत को भी अब कुर्बानी कहलाने दो। मज़हब से वतनपरस्ती कहाँ तय होती है, जो हिन्दू नहीं है उसे भी हिंदुस्तानी कहलाने दो।।