कुआँ कहीं का हो, पानी को पानी कहलाने दो,
किसानों की मौत को भी अब कुर्बानी कहलाने दो।
मज़हब से वतनपरस्ती कहाँ तय होती है,
जो हिन्दू नहीं है उसे भी हिंदुस्तानी कहलाने दो।।
किसानों की मौत को भी अब कुर्बानी कहलाने दो।
मज़हब से वतनपरस्ती कहाँ तय होती है,
जो हिन्दू नहीं है उसे भी हिंदुस्तानी कहलाने दो।।
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