Monday, 19 March 2012

कुछ दिनों पहले ऋषिकेश के निकट शिवपुरी की यात्रा की. उस सुन्दर और मनोरम स्थान के लिए कुछ पंक्तियाँ :

ये कैसी वादियों में आ गए लेकर मुझे यारों 
यहाँ धरती नरम अब भी, है अम्बर आज भी नीला, 
किसी ने क्यारियों में रंग जी भर कर यहाँ घोला,
यहाँ अब भी भटकता है कोई फनकार रंगीला,
शहर की बारिशों में भी कोई खुश्की झलकती है,
यहाँ महसूस होता है मुझे मरू में भी कुछ गीला,
जो तारों को शरम आई, उन्होंने ओढ़ ली चादर,
छुपाने चाँद को आया ,कोई बादल था बर्फीला 
शाम की शख्सियत देखो, सुबह की खासियत देखो, 
चाँद ज्यादा ही नाजुक है, है सूरज और चमकीला,
मुझे खोना नहीं है भीड़ में, लाशों में, धुएं में,
मुझे मरना नहीं है आग में जल के मशीनों में,
रुकूँगा मैं क़यामत तक, इसी वादी मेरे यारों,
जहाँ धरती नरम अब भी, जहाँ आकाश है नीला.......

Tuesday, 13 March 2012

वो मुझको देखकर रोता, बड़े दिन बाद मुसकाये,
निकम्मे ये मेरे आंसू, चलो कुछ काम तो आये |