Saturday, 5 November 2011

मेहक

उधर की और से आती, हवा में एक खुशबू  है,
कोई निकला है अब घर से, किसी ने ज़ुल्फ़ है झटकी


कि जिसके नाम से रौनक, हर इक मुंडेर पे होती
 गुज़रती रोज़ इस रस्ते, वोही लड़की लिए मटकी


लो आया एक दिन ज़ालिम, दिया कर काम कुछ ऐसा
बड़ी नाजुक सी गागर थी, जो उसने जोर से पटकी


 गयी मुंडेर कि रौनक, हवा भी आज रूखी है
 खड़े खामोश अब रस्ते, है सूनी राह पनघट की

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