सोचता हूं,
सच के लिये लडता रहूं ,
या झूठ मे ही खो जाऊं
तुम सब् को बदल डालूं
य तुम सा ही हो जाऊं
गर सुबह होने वाली है रात से भी काली
क्यूं ना सूरज के जागने से पेहले मै सो जाऊं
सच के लिये लडता रहूं ,
या झूठ मे ही खो जाऊं
तुम सब् को बदल डालूं
य तुम सा ही हो जाऊं
गर सुबह होने वाली है रात से भी काली
क्यूं ना सूरज के जागने से पेहले मै सो जाऊं
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