शुद्ध बकैती
Blog of Mukund Madhav Mishra
Tuesday, 14 February 2012
सब ज्ञानी बैठे सिंहासन, थी जिनको प्रभु किरपा की आस |
मैं मूढमति कुछ न समझा, जा बैठा हरि चरणों के पास ||
ना ज्ञानीजन ना सिंहासन, कुछ आये ना भगवन को रास |
आकर के मुझको अंक लिया, बुझ गयी मूर्ख के हिय की प्यास||
Saturday, 4 February 2012
निर्धन की भी हैसियत,मंगतों की भी साख
देखो तो इंसान को, लेकर मेरी आँख |
Wednesday, 18 January 2012
ग़ालिब या मीर बन पाऊ ऐसी तो काबिलियत नहीं
दिल की बात दिल तक पहुचे, इतनी सी कोशिश मेरी |
Friday, 13 January 2012
अँधेरा गर नहीं होता, मुझे कैसे पता चलता
जिसे पत्थर समझता था, वो था हीरे का इक टुकड़ा |
Thursday, 12 January 2012
तुम और मैं
दोनों को दौलत की चाह थी, दोनों को खजाने की तलाश
तुमने खोद डा
ले धरती, दरिया समंदर, मैं खगालता रहा दिल-ओ-दिमाग को|
तुम्हे बादलों के पार उड़ने का शौक था,मुझे ज़मीन पे रहने की आदत
हिस्से तुम्हारे आई गर्म धूप, मुझे भिगोया फुहारों ने|
तुम्हारे हाथ में हीरा, था मेरे पास आइना
सभी को चाह दौलत की , किसी ने अक्स कब छीना |
तुम डरते रहे मरने से, मैंने मौत कोगले लगाया
तुम कभी जी नहीं सके, मैं कभी मरा नहीं |
Monday, 9 January 2012
धुंध
एक अरसे से फर्श की धूल साफ़ नहीं की,
डरता हूं तेरे क़दमों के निशान मिट ना जाए
तारों की रोशनी धुंधली हो रही है
चाँद की गैरहाजिरी में आसमान मिट ना जाए
तुम थे तो जुनूं था मसीहा बनने का मुझे
इस तनहाई में मेरा इंसान मिट ना जाए
तुम आना तो थोड़ी ज़िंदगी लेकर आना
यहां मौत पसरी है, ये जहान मिट ना जाए
Thursday, 5 January 2012
Disclaimer!!
शायर तो
जज्बातों
को
कागज़ पे तराश लेते हैं ,
हमने तो थोड़ी
लफ्जों
की कारीगरी ही सीखी है |
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