Monday, 9 January 2012

धुंध

एक अरसे से फर्श की धूल साफ़ नहीं की,
डरता हूं तेरे क़दमों के निशान मिट ना जाए 

तारों की रोशनी धुंधली हो रही है 
चाँद की गैरहाजिरी में आसमान मिट ना जाए 

तुम थे तो जुनूं था मसीहा बनने का मुझे
इस तनहाई में मेरा इंसान मिट ना जाए 

तुम आना तो थोड़ी ज़िंदगी लेकर आना 
यहां मौत पसरी है, ये जहान मिट ना जाए 

1 comment:

  1. तुम थे तो जुनूं था मसीहा बनने का मुझे
    इस तनहाई में मेरा इंसान मिट ना जाए

    Nice lines!!!

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