कंपनी का सबसे बड़ा केबिन,
बाहर मैनेजिंग डिरेक्टर का बोर्ड, अन्दर सुसज्जित
टेबल, जरूरत की हर चीज, और उससे कुछ ज्यादा,
कुछ गैर जरूरी चीजें, जिन्हें भौतिक विकासवादी
सभ्यता ने जरूरी से भी ज्यादा जरूरी बना दिया है. केबिन की अन्दर
मैं अपनी कुर्सी पर बैठा फाइलों और दस्तावेजों को समझता और उनपर हस्ताक्षर करता.
ये हस्ताक्षर भी कमाल की चीज है जनाब. अपने नाम
के आकार के हिसाब से लगभग दस तक व्यंजन और कुछ स्वर और मात्राएँ जिसने सीख ली वो हस्ताक्षर
तो कर ही सकता है, लेकिन हस्ताक्षर की महत्ता आपके पद से बनती
है. जितना बड़ा और प्रभुत्वशाली पद, हस्ताक्षर
की उतनी ही कीमत. और तथाकथित सेलेब्रिटीज के हस्ताक्षरों को लेने
के लिए तो उनके फैन्स पागल ही रहते हैं. पर दुखद ये है कि बड़े
से बड़ा विशेषज्ञ भी शायाद ही हस्ताक्षर देख कर किसी के चरित्र का वर्णन कर पाए,
और इसीलिए सलाह ये है कि आप कितने भी चरित्रवान हों, सिद्धांतवादी हों और बड़े विचारक हों, यदि आपके पास कोई
बड़ा ओहदा नहीं है, या आप टी. वी.
पर नज़र नहीं आते, मीडिया ने आपको सेलेब्रिटी घोषित
नहीं किया है तो कभी ये आशा न रखे कि आपके हस्ताक्षर किसी के लिए महत्त्वपूर्ण होंगे.
लेकिन मैं तो मैनेजिंग डिरेक्टर हूँ, और इसीलिए
मेरे हस्ताक्षरों को भी खुद पर उतना ही अभिमान है, जितना मुझे
खुद पर है. हम दोनों ही खुद पर बहुत समय देते हैं. मेरे हस्ताक्षर बनने में समय लेते हैं, सजते हैं,
और संवरते भी. मेरे अभिमान कि लिखित अभिव्यक्ति,
अहम कि पुष्टि का एक साधन हैं मेरे हस्ताक्षर. अब आप सोचते होंगे कि मुझे खुद पर इतना अभिमान क्यों है, होते होंगे बहुतेरे मेरे जैसे मैनेजिंग डिरेक्टर. तो
ज़रा आपको इतिहास में ले चलूँ. जन्म एक बहुत ही संपन्न परिवार
में हुआ जो संपन्न होने के साथ साथ अति सम्मानित भी था. महल जैसे
दिखने वाले घर में नौकरों कि लगभग कतारें लगी रहती थी. ऐसी कोई
वस्तु नहीं थी जिसकी मैंने इच्छा की हो और न मिली हो. शिक्षा
भी सबसे अच्छे स्कूल से शुरू हुई और लन्दन के मशहूर मैनेजमेंट स्कूल में जाकर पूरी
हुई. कॉलेज से स्नातक करने के बाद ही मैं एक सफल युवा बन चुका
था. गठीला और पुष्ट शरीर, नुकीले नैन नक्श,
चेहरे पर एक ओज, भाषा और शैली ऐसी जो किसी भी सभ्य
समाज में एक प्रभावी व्यक्तित्व की निशानी माने जा सकें, ये सारी
बातें थी जो मुझे अपने शहर का सबसे सफल युवा सिद्ध करने के लिए पर्याप्त थीं,
कम से कम मेरी दृष्टि में.और जब मुझे पता था की
मैं एक सुन्दर और सफल नौजवान हूँ, तो मैंने दुनिया को अपने चश्मे
से देखना शुरू कर दिया. दफ्तर का काम, सुबह
की जोगिंग, शाम को दोस्तों के साथ कुछ गपशप, इन सब के साथ मेरा दुनिया का वर्गीकरण भी सतत चलता रहता था. मैं लगातार अपने आस पास लोगों को दो श्रेणियों में बांटता रहता था.
ये श्रेणियां होती थीं सफल और असफल, बलवान और कमज़ोर,
धनी और निर्धन, सुन्दर और असुंदर. हर बार जब मुझे कोई कमजोर, निर्धन या असुंदर दिखता तो
मैं उसके साथ अपनी तुलना करता और खुद की श्रेष्ठता की पुनर्स्थापना करता. सुन्दरता की मेरी परिभाषा एक आम आदमी की परिभाषा से ज्यादा अलग नहीं थी,
हाँ मैं अपनी परिभाषा के साथ कुछ ज्यादा ही रूढ़ था. मेरी नज़रों में सुन्दरता थी बड़ी बड़ी आँखें, जिनमे सफेदी
बर्फ की सी और स्याह हिस्सा उस अँधेरे जितना काला जो अब रात होने पर भी नहीं दिखता,
जो चेहरे पर इस तरह जड़ी हुई हों कि दायीं आँख दायीं तरफ उतनी ही दूर
जाती हो जितनी बायीं आँख बांयी तरफ. भौएँ ऐसी कि लगे किसी ने
आँखों कि सुरक्षा के लिए पहरेदार लगा रखे हों, और ये उनकी तलवारें
हों. नाक नुकीली और बिलकुल मध्यम आकर और ऊँचाई की, होठ गुलाब की पंखुड़ियों सरीखे नाजुक जो मुस्कुराते समय सिर्फ उतने खुलते हों
जिससे आठ से ज्यादा दांत दिखाई न पड़ें, कोमल कपोल आँखों के नीचे
कुछ इस तरह झुकते हों कि अगर कभी कोई आंसू निकले तो धरती पे गिरने से पहले उसे ठहरने
का एक मौका मिले.वैसे तो मैं दूसरों को असुंदर घोषित करके अधिक
खुश होता था, लेकिन मेरे आस पास ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी
जो सुन्दरता के मेरे पैमाने पर खरे उतरते थे. इन सब के बीच मेरे
दिन ख़ुशी के साथ बीत रहे थे.
एक दिन पिताजी का ख़त आया.
आजकल के टेलीफ़ोन और ई मेल के युग में भी पिताजी को ख़त लिखना पसंद है.
आज भी उनके ख़त उतने ही सुरुचिपूर्ण ढंग से लिखे होते हैं. सही आकर का अच्छा काग़ज़, नपी तुली लिखावट, और स्पष्ट भाषा. पिताजी ने इस बार लिखा था की वो शहर
के मकान से वापस अपने गाँव वाली हवेली में जाकर रहना चाहते हैं. तर्क ये था की डॉक्टर ने प्राकृतिक जलवायु में रहने की सलाह दी है.
लेकिन मैं सब कुछ समझ गया था. पिताजी गाँव से शहर
के मकान में तब आये थे जब मैं कोई १२ वर्ष का था. पिताजी ने अपना
पूरा बचपन और युवावस्था के अच्छे दिन उस गाँव के मकान में बिताये थे. कहते हैं बुढ़ापे में इन्सान का बचपन वापस आ जाता है. लेकिन बचपन और बुढ़ापे में एक मूलभूत अंतर होता है. उम्र
के अंतिम पड़ाव में किसी वृद्ध के पास आगे देखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं होता.
भविष्य बिलकुल सिमट सा गया लगता है. और अक्सर वर्त्तमान
में कुछ भी बहुत रोचक नहीं होता. कुल मिला कर कुछ बचता है तो
वो होता है अतीत. अतीत के कुछ पल जिन्होंने मुस्कुराने के मौके
दिए, आज भी गुदगुदाते हैं, और कुछ ऐसी यादें
जिन्होंने खूब रुलाया था, आज एक संतोष सा दे कर जाती हैं कि वो
दिन अब बीत चुके हैं और शायद रुलाने के लिए कभी वापस नहीं आएंगे. गाँव के मकान में वापस जाकर पिताजी भी अपने उस अतीत को दुबारा जीना चाहते थे,
फिर से महसूस करना चाहते थे गौरव, गर्व और उत्साह
को, प्रभुत्व को, सत्ता को. मैंने उनके फैसले को सहजता से स्वीकार कर लिया, इसलिए
नहीं की मैं उनके भावों को उस समय पूरी तरह समझ गया था, बल्कि
इसलिए कि मेरी दुनिया अब पिताजी की दुनिया से दूर मेरे शहर और मेरे आस पास रहने वाले
मित्रों, या मित्रों जैसे दिखने वाले कुछ स्वार्थ सिद्ध करने
वालों, जो अपना काम निकल जाने के बाद मुझे पहचानने से भी मना करने वाले थे,
में सिमट कर रह गयी थी, और मुझे कोई खास फर्क नहीं
पड़ने वाला था पिताजी के गाँव वापस जाने से.
जून का महीना, जिस समय मेरी
कंपनी में काम का बोझ कुछ कम और बिजली विभाग के ऊपर पावर का बोझ जरूरत से कुछ ज्यादा
होता है. पिताजी को गाँव के मकान में गए हुए लगभग आठ महीने हो
चुके थे और उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया था. थोड़े अस्वस्थ
थे और मुझसे मिलने का बड़ा जी कर रहा था उनका. ये सही समय था
जब मैं भी इसी बहाने थोड़ी छुट्टी मना सकता था. छुट्टी की अर्जी
को मंज़ूरी मिलने में कोई खास परेशानी नहीं हुई. लेकिन गाँव पहुचना
उतना आसान काम नहीं था. नजदीकी हवाई अड्डा भी दूर था,
वहाँ से रेलगाड़ी और बस लेने के बाद भी दो किलोमीटर की दूरी के लिए घोडा
गाड़ियों पर निर्भर रहना पड़ता था जो की कभी चालक तो कभी घोड़े के ख़राब मूड के कारण
बाहर निकलती ही नहीं थीं. लेकिन मुझे खास परेशानी नहीं हुई और
किस्मत से एक जीप जो गाँव की तरफ आ रही थी, मुझे बस अड्डे पर
मिल गयी और मैं ठीक हवेली के सामने आकर रुका. हवेली का मुख्य
दरवाजा इमारत से दूर था और एक कच्चा रास्ता वहाँ से जाता था जिसपर कभी दादाजी की बग्गी
चला करती थी. इस कच्चे रस्ते के दोनों तरफ सुन्दर क्यारियां हुआ
करती थीं. अब वो सुन्दर पौधों की पंक्तियाँ झाड में तब्दील हो
चुकीं थीं. कारण था कि पिताजी के शहर चले जाने के बाद उन्हें
किसी माली की देखरेख नहीं मिली. हमारे मन की इच्छाएं भी इन पौधों
की तरह होती हैं. अगर इनपर अंकुश रखा जाये तो जीवन किसी बाग़
जैसा सुन्दर होता है लेकिन अनियंत्रित और निरंकुश इच्छाएं झाड़ियों की तरह बढती हैं
और जीवन को जंगल जैसा बना देती हैं. वो कच्चा रास्ता भी अब बदल
गया था. जी नहीं, रास्ते ने अपनी लम्बाई
नहीं बदली थी, लेकिन उनपर चलने वाले पैर बदल चुके थे.
मेरे बचपन के नन्हे कदम अब पहले से कहीं अधिक तेज हो गए थे और रास्ता
मेरे लिए छोटा, जबकि पिताजी के कदम अब धीरे चलने लगे थे,
और उनके लिए ये रास्ता अब बहुत लम्बा हो चुका था.वहां पहुँच कर मुझे भी कुछ पुराने बचपन के दिन याद आ गए, लेकिन उन यादों के प्रति मेरा कोई विशेष रुझान नहीं था.
हवेली की थोड़ी बहुत साफ़ सफाई की गयी थी फिर भी
उसका बुढ़ापा झलक रहा था. चमकते पेंट के अंदर से कुछ पुराने
दाग बाहर झांकने की कोशिश में लगे हुए थे, टूट फूट को ठीक करने
के लिए लगाईं गयीं ईंटें उसी तरह से पहचानी जा सक रहीं थीं जैसे कोई यूरोपीय भारत में
लंबे समय तक रहने के बाद भी भीड़ में पहचाना जा सकता है. मैं दरवाजे
तक पहुंचा जो मुझे पहली बार बंद दिखाई दिया.मेरे बचपन के दिनों
में इस दरवाजे से इतनी आवाजाही लगी रहती थी की कभी इसे बंद होने का मौका ही नहीं मिलता
था, और न ही कभी ज़रूरत पड़ती थी. कुण्डी
खटखटाने के कुछ आधे मिनट बाद दरवाजा खुला और सामने एक लगभग बीस बाईस वर्षीय युवती दिखाई
दी. मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी. छोटी छोटी
आँखें, सांवला रंग, मोटी चपटी सी नाक, और कुल मिला कर मेरी नज़रों में एक
भद्दा चेहरा. मैंने उसका नाम, उसकी पहचान,
कुछ भी जानने से पहले अपनी तरफ से उसका नाम रख दिया – असुंदर! "साहब, मैं बड़े साहब
के माली दीनानाथ की लड़की हूँ, कमला, पहचाना
आपने?" वो लगभग हँसते हुए अपनी पहचान देती है. मुझे याद आ गया, कमला के जन्म के लगभग तीन साल बाद ही
हम शहर में आ गए थे. उसके पिता ने मेरे पिताजी की बहुत सेवा की
थी, लेकिन वो हमारे साथ
शहर नहीं आये , गाँव में ही रह गए, और शायद खेतों में मजदूरी करने लगे थे. उनकी शादी के
दस साल बाद कमला का जन्म हुआ था, पता नहीं दीनानाथ जी को फिर
और कोई संतान हुई या नहीं. मैंने कमला की बातों पर ज्यादा ध्यान
न देते हुए सीधे पूछा, माँ और पिताजी किस कमरे में हैं?
सवाल बेवकूफाना था. अपने पुराने कमरे के अलावा
पिताजी भला और कहाँ रहना पसंद करते. पुरानी यादों का सबसे बड़ा
खज़ाना तो उसी कमरे में कही छुपा हुआ था. दीवारों पर जो कहानियां
विस्तार से लिखी हुईं थीं , दरवाज़ों पर उन्ही के सारांश लिखे
थे, और छत समय समय पर उन्ही कहानियों का नया भावार्थ सुनाती रहती
थी.
पूरे एक
वर्ष बाद माँ और पिताजी से मिलकर बड़ा हर्ष हुआ. लगभग आधे घंटे
तक हमलोग मेरे ऑफिस, काम और नए शहर की बातें करते रहे.
फिर माँ मेरे लिए खाने पीने का इंतजाम करने चली गयीं. बातें थोड़ी देर के लिए थमीं तो मैंने कमरे को निहारना शुरू किया. उसके पुराने स्वरुप को जिंदा रखने का भरसक प्रयास किया गया था. दीवार पर पिताजी के समय की घंटा घडी अब भी टंगी हुयी थी, लेकिन वो चलती न थी. समय को थाम लेने की कोशिश में वो
पीछे कैसे रहती. "दरवाजे पर जो मिली थी वो कमला है, दीनानाथ की बेटी "
पिताजी ने थोड़ी देर की उस चुप्पी को तोड़ते हुए कहा. "हाँ, बताया था उसने" मैंने
उदासीन सा उत्तर दिया. पिताजी ने अब उसके बारे में बताना शुरू
किया-"हमारे शहर जाने के बाद दीनानाथ ने मजदूरी शुरू कर
दी थी. जब कमला १२ साल की थी, दीनानाथ का
हाथ मशीन में आ गया और उसे काटना पड़ा. फिर उसने ठाकुरों के वहां
काम करना शुरू कर दिया. एक हाथ से बस वो बड़े ठाकुर को पानी और
दवा देने का काम कर पा रहा था. उसकी पत्नी और कमला ने घर का खर्च
चलाने के लिए खेतों में काम करना शुरू कर दिया. बेचारी ने काम
के साथ साथ बड़ी मुश्किल से इंटरमीडिएट परीक्षा पास की. लेकिन
समझदारी में किसी ग्रेजुएट से कम नहीं है. जब दीनानाथ ने सुना
की पंडित जी गाँव रहने के लिए आये हैं तो तुरंत कमला को भेज दिया. वो खुद कमजोर हो गया है, मैं नहीं चाहता मेरे लिए वो
बीमार पड़े." पिताजी बताते जा रहे थे लेकिन मैं कुछ खास दिलचस्पी
नहीं ले रहा था. ”बिट्टू खाना तैयार है,
आ जाओ और बाबूजी को भी ले आओ. आज सब मिल कर खाना
खायेंगे”, माँ ने नीचे से आवाज़ लगाई. खाना
बनाने से लेकर घर की साफ़ सफाई, पिताजी की देख रेख और दूसरे छोड़े
बड़े काम आजकल कमला ही कर रही थी. पहले हम आसन बिछा कर खाना खाया
करते थे. लेकिन अब एक खाने की टेबल और कुछ कुर्सियां,
जो कि गाँव के ही किसी बढ़ई से बनवाये गए थे, और
डाइनिंग फर्नीचर जैसे बिलकुल नहीं दिख रहे थे, अच्छी तरह सजाये
गए थे. माँ और पिताजी को ये एहसास था कि अब मेरी आदतें बदल चुकी
थीं. मुझे बुलावा भेजने के बाद शायद उन्हें ख्याल आया हो कि बड़े
शहरों में तो सब टेबल पर ही खाते हैं.
आनन फानन में ये देसी डाइनिंग फर्नीचर तैयार करवाए गए होंगे.
टेबल पर मेरी पसंद के सभी व्यंजन सजे थे.
भले ही टेबल अच्छा नहीं था, लेकिन उस पर भोजन परोसने
का तरीका किसी ट्रेंड शेफ के काम सरीखा था. भोजन भी लाजवाब बना
था. पर मुझे इस लाजवाब भोजन बनाने वाली का चेहरा पसंद नहीं था.
मैं नहीं चाहता था कि वो चेहरा मेरी खाने की टेबल के इर्द गिर्द घूमे.
पिताजी भी बस किसी से भी प्रभावित हो जाते हैं. मुझे नहीं लगता इस लड़की में कोई समझ भी होगी. जिसका चेहरा
ऐसा है उसकी बुद्धि भी वैसी ही होगी. ये सब सोचने के साथ ही मैं
खुद को उस डाइनिंग टेबल के अटपटेपन के साथ सहज होने की हिदायत देता जा रहा था ताकि
पिताजी को ऐसा ना लगे की वो अच्छी व्यवस्था नहीं करा पाए. लेकिन कमला ने मेरी परेशानी
को तुरंत भांप लिया. “साहब, मैंने आपसे पहले ही कहा था की डाइनिंग टेबल ऐसे नहीं हुआ
करते ”, कमला ने कुछ दिन पहले इस विषय पर हुई चर्चा का जिक्र करते हुए कहा, “सही आकार
और ऊँचाई न हो तो ये सुविधा की वस्तु नहीं परेशानी का सबब बन जाता है ”. मुझे थोडा
आश्चर्य हुआ, इस गाँव की लड़की को शहरों में इस्तेमाल होने वाले फर्नीचर के बारे में
इतने अच्छे से कैसे पता था?क्या कमला सचमुच प्रतिभावान थी?क्या मेरा पूर्वाग्रह गलत
था?मैं तो बुद्धिमान था, समझदार और सफल भी, फिर मैं क्यों स्वीकार कर लूँ कि बारहवीं
परीक्षा पास एक भद्दी सूरत वाली लडकी, जिसे मैंने नासमझ घोषित किया था वो असल में नासमझ
नहीं थी.
भोजन के बाद बातचीत का एक और दौर शुरू हुआ. बातों
बातों में पिताजी ने फिर से कमला का जिक्र किया- “बिट्टू , कमला और पढ़ना चाहती है.
दीनानाथ से कहने की उसकी हिम्मत न हुई. वो तो मैं और तेरी माँ जब बातों बातों में उससे
पढाई लिखाई के बारे में पूछ रहे थे तब पता चला कि इस लड़की को पढ़ने का कितना शौक है.
मुझे पता है, दीनानाथ को इस उम्र में छोड़ कर वो पढ़ने के लिए बाहर जाने को बिलकुल तैयार
नहीं होगी. मैं सोच रहा था अगर तुम इसका दाखिला किसी कोरेस्पोंडेन्स कोर्स में करा
दो तो कैसा रहेगा?” इस बार मैंने थोड़ी झुंझलाहट के साथ जवाब दिया –“क्या पिताजी, आप
भी किसी से भी बस यूँ ही प्रभावित हो जाते हैं. मुझे याद है, एक बार आप एक ज्योतिषी
से इतने प्रभावित हो गए थे कि उसके दिए हुए हरे प्लास्टिक को पन्ने के दामों में खरीद
लिया था. आजकल पढाई करना इतना आसान नहीं है. कोर्सेस की फीस भी बहुत ज्यादा होती है
आजकल. और चलिए फीस की बात को एक बार भूल भी जायें, तो भी मैं नहीं चाहता कि आप उसका
फिर से दाखिला कराएँ. गाँव में रहते हुए कहाँ पढ़ पाएगी वो. और अगर फेल हो गयी तो कितना
दुःख होगा, उसे भी और आपको भी. भावनाओं के आधार पर फैसले लेना हमेशा सही नहीं होता.
वस्तुस्तिथि को ठीक से समझना भी जरूरी होता है.” पिताजी ने सिर्फ एक गहरी सांस ली.
ये एक संकेत था कि भले ही उनका मन कुछ और चाह रहा था पर उनकी बुद्धि ने मेरे तर्कों
को स्वीकार कर लिया था, और न चाहते हुए भी पिताजी ने बुद्धि की बात मान ली थी.
गाँव आये हुए पांच दिन बीत चुके थे. कमला मेरे
पूरे परिवार की सेवा में निष्ठा से लगी हुई थी, और हर रोज मुझे कोई ऐसा कारण देती थी
जो मेरे मन में जड़ हो चुके उसके व्यक्तित्व के वर्णन को चुनौती देता था. मैं हर चुनौती
को स्वीकार करता और उसके सामने डटा रहता. हो सकता है कि मैं ग़लत था, लेकिन मैं हारना
नहीं चाहता था. जीतना अब मेरी आदत नहीं, जिद बन चूका था. लेकिन हमारे सोचने और समझने
कि क्षमता से परे, सत्य अपनी स्थापना करने के अपने तरीके रखता है, और इनमे पारंगत भी
है. जिंदगी को मुझे अभी बहुत से सबक सिखाने थे, और इसके लिए मुझे झकझोरना ज़रूरी था,
क्योकि वर्तमान मनःस्थिति में मैं कुछ भी ग्रहण करने को तैयार नहीं था. ऑफिस से अचानक
एक तार आया. मेरे किसी ग़लत निर्णय के कारण कंपनी के शेयरों में भारी गिरावट आ गयी थी
और बोर्ड ऑफ डिरेक्टर्स ने चेयरमैन के पास मुझे निलंबित करने की सिफारिश भेजी थी. उस
तार को पढ़ कर मुझे जो तकलीफ हुई थी उसको शब्दों में बता पाने के लिए अच्छे से अच्छे
कहानीकार को नए शोध की जरूरत पड़ सकती थी. अगर कोई मुर्दा फिर से ज़िंदा होकर आ जाए और
मौत के उस आखिरी क्षण का दर्द बयां करे तो ही संभव था कि वो मेरी पीड़ा के किसी अंश
के सामानांतर खड़ा हो पाए. इस कागज के एक टुकड़े ने मेरी योग्यता पर गंभीर सवालिया निशान
लगाये थे, और भरपूर चोट की थी मेरे व्यक्तित्व और अस्तित्व पर. वर्षों से पुष्ट मेरा
अहम धराशायी हो गया था. तार को वहीँ टेबल पर फ़ेंक कर मैं अपने कमरे में चला गया. इतनी
हिम्मत नहीं थी कि माँ या पिताजी को इसके बारे में कुछ बता पाता. कुर्सी पर बैठे हुए
आँखें बंद करके मैं सोचने की कोशिश कर रहा था लेकिन मस्तिष्क विचार शून्य हो गया था.
सब कुछ खत्म सा हो गया लगता था. कमरे में खूब रौशनी थी, लेकिन उम्मीद की किरण किसी
भी कोने से आती नहीं दिख रही थी. निराशा को आज मौका मिला था, उस घर में पसरने का, जहाँ
उसका अंदर आना भी मना था. तभी किसी ने कुण्डी खडखडायी. बाहर कमला थी. आपके लिए चाय
लायी हूँ साहब कहते हुए वो अंदर आ गयी. चाय टेबल पर रखकर वो वहीँ कुर्सी के पास खड़ी
हो गई. आँखें हलकी सी घुमा कर उसकी ओर देखा और फिर गहरी सांस छोड़ते हुए मैंने आँखें
बंद कर लीं. “मैंने नीचे टेबल पर रखा आपका तार पढ़ा साहब”, मेरी आँखों ने जो सवाल किया
था उसका कमला ने ये जवाब दिया. अगर कोई और दिन होता और ये कोई और तार तो शायद मैं कमला
को बिना पूछे अपना तार पढ़ने के लिए कड़ा दंड देता. लेकिन मैं खुद चाहता था कि कोई तो
हो जिसे मैं अपना दुःख बता सकूं, अपनी तकलीफ का कुछ हिस्सा बाँट सकूं. मुझे लगा कोई
नहीं तो कमला ही सही. मैंने आँखें खोलकर बिना कुछ कहे उससे एक बार फिर सवाल किया, और
आश्चर्य ये था कि वो फिर से बड़ी आसानी से मेरे मौन को समझ गयी. उसने बोलना शुरू किया-“साहब,
आप तो जानते होंगे की हमें दुःख कब होता है, कब हम दर्द महसूस करते हैं. हम सब जानते
हैं, और कोई ज़रूरत नहीं फिर से सब कुछ दोहराने की. लेकिन आपको ये पता है साहब की हमारी
तकलीफ, दुःख-दर्द कब सहनशीलता से परे हो जाते हैं? कब हमें लगने लगता है की इस दुःख
का कोई अंत नहीं, कब ऐसा लगता है की ये दुःख मृत्यु से भी ज़्यादा भयंकर है?इश्वर ने
सृष्टि की रचना के साथ ही सुख और दुःख को भी जोड़ दिया हमारे जीवन के साथ. पर उन्होंने
इतना ही नहीं किया, उन्होंने दुःख बनाने के साथ हमारे अंदर उस दुःख को सहने और उससे
उबरने की क्षमता भी विकसित की. दुःख हमारे जीवन में आता ज़रूर है लेकिन इसके अधिकार
सीमित हैं. दुःख को कोई अधिकार नहीं है कि वो हमारे जीवन पर पूरी तरह हावी हो जाये.”
जब मैंने कमला को बोलने की इजाज़त दी थी तब मेरी उससे इतनी ही अपेक्षा थी कि वो आमतौर
पर किसी परेशान व्यक्ति को सांत्वना देने के लिए बोले जाने वाले प्रचलित वाक्यों में
से किन्ही एक दो का चुनाव करके उन्हें मेरे सुपुर्द करे और चली जाये. लेकिन उसके शब्दों
और वाक्यों का चुनाव अप्रतिम था. जीवन के इतने गंभीर दर्शन को मैंने कभी भी इस नज़रिए
से नहीं समझा था. अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ अब मैं सजग होकर उसकी आँखों में आँखें डाल
कर बातें सुनने लगा. ये पहली बार था जब कमला के चेहरे या उसके तथाकथित भद्देपन का मुझपर
कोई असर नहीं था. मुझे कोई आपत्ति नहीं थी उसकी ओर देखते हुए उसकी बातें सुनने में.
थोड़ी देर रुकने के बाद उसने निगाहें दूसरी तरफ टिका लीं और फिर से बोलना शुरू किया.
ऐसा लग रहा था जैसे वो मुझसे नहीं बल्कि खुद से बातें कर रही थी. “आपको पता है वो कौन
सी चीज़ है जो इश्वर ने हमें वरदान में दी है, और जो हमें दुःख और कष्ट से उबरने में
मदद करती है? वो चीज़ है उम्मीद, आशा !! हारे हुए के पास फिर से जीतने की आशा होती है,
लुट गए इंसान के पास सब कुछ फिर से हासिल कर लेने की आशा होती है. कोई बीमार अपने जल्दी
स्वस्थ होने की आस लगाये रहता है, जंगल में फंस गए को आस होती है कि कोई न कोई पगडण्डी
किसी न किसी गाँव तक ज़रूर ले जायेगी, और अँधेरे के सताए हुए को आस होती है अगले दिन
आने वाले सूरज की. कभी कभी ऐसा लगता है कि सारे रास्ते बंद हो गए. कोई आशा नहीं बची,
कोई उम्मीद नहीं. ऐसे में ही हम सबसे ज्यादा दुःख महसूस करते हैं. निराश व्यक्ति ही
अपने जीवन को समय से पहले खत्म कर लेने की सोचता है. लेकिन सच्चाई तो ये है कि इश्वर
की रचना में कोई न कोई आशा कहीं न कहीं हर परिस्थिति में छुपी होती है. हाँ, हर बार
हर उम्मीद सूरज जितनी चमकीली नहीं होती. कई बार उम्मीद तारों जैसी टिमटिमाती है, और
कभी कभी जुगनू जैसी इधर उधर मंडराती है. बस ज़रूरत है उसे ढूंढ लेने की, पहचान लेने
की. ध्यान से देखिये साहब, आपका जुगनू भी आस पास ही कहीं उड़ रहा होगा.” मैंने सिर्फ
सहमति में सर हिलाया और कमला बहुत छोटी सी मुस्कराहट देती हुयी चली गयी. थोड़े समय तक
अपनी कुर्सी पर बैठे बैठे कुछ सोचने के बाद मैं उठा और बाजार कि तरफ चल पड़ा. मैंने
फोन लगाया अपने सेक्रेटरी को और कुछ दस्तावेजों को देखकर मुझे बताने को कहा. शाम तक
मैं और मेरा सेक्रेटरी दोनों एक दूसरे को फोन करते रहे और गलती को समझने की कोशिश करते
रहे. सेक्रेटरी अपने मालिक का हुक्म बजा रहा था जबकि मैं अपने उस जुगनू कि तलाश में
था जिसे ढूँढने के लिए सुबह मुझे किसी ने कहा था. आखिर रात के आठ बजे के करीब एक जुगनू
मिल ही गया, और अगली सुबह तक वो बड़ा होकर पूरे सूरज में तब्दील हो गया. मुझे पता चल
गया था कि गलती कहाँ हुई थी. सिर्फ इतना ही नहीं, मुझे ये भी पता चल गया था कि असल
में मैंने गलती की ही नहीं थी. ये किसी और की गलती थी. मैं वापस जाने की तैयारी करने
लगा. जो कुछ भी हुआ था, मैं उसे ठीक कर लेना चाहता था, जितना जल्दी हो सके उतना. लेकिन
शहर जाकर सब कुछ सुधरने से पहले मुझे यहाँ भी कुछ सुधारना था. जाने से पहले मैं पिताजी
से मिलने गया और उनसे कहा कि मैं शायद गलत था और उनका कमला की पढाई फिर से शुरू करने
का विचार बहुत अच्छा था. मैंने कोर्रेस्पोंडेंस के सभी कोर्सेस की जानकारी शीघ्र ही
भेजने का वचन दिया और आशीर्वाद लेकर शहर के लिए निकल पड़ा.
दो महीने बीतने के बाद सब कुछ ठीक हो चुका था.
कंपनी में मेरी इज्ज़त और धाक पहले जैसी हो गयी थी. मैंने पिताजी को कुछ कोर्सेस की
जानकारी भेजी थी और जवाब में उन्होंने लिखा कि कमला को समाज शास्त्र में बी. ए. का कोर्स पसंद आ रहा है. कमला की समाज
शास्त्र में रूचि कोई आश्चर्य का विषय नहीं थी. बचपन से ही उसने समाज के ताने बाने
को बड़े करीब से देखा और महसूस किया था. जातिगत समीकरणों और उनके समाज में अर्थ के वितरण
पर प्रभावों को समझने के लिहाज से हमारा गाँव एक आदर्श उदाहरण था. इसके साथ ही बदलते
समय के भी अपने प्रभाव थे. एक पीढ़ी पहले जहाँ दीनानाथ जैसे निष्ठावान सेवक हुआ करते
थे वहीँ आज के युवा, जो अपने आप को अधिक शिक्षित और जागरूक समझने लगे हैं, सिर्फ संख्याओं
की गणित में लगे दीखते हैं. निष्ठा, प्रेम, दया, करुणा, आदर, और भक्ति, अब इन सब की
कीमतें तय हो गयी हैं. सेवक उस स्वामी के प्रति अधिक निष्ठावान है जो अधिक पारिश्रमिक
देता है. पता नहीं इसको निष्ठा कहना कहाँ तक उचित है. अब के समाज में शिक्षा भी व्यवसाय
बन गयी है. जहां पिताजी के समय के शिक्षक नयी पीढ़ी को पोषित करने के उद्देश्य से शिक्षा
का दान करने में विश्वास रखते थे वहीँ अब हमारे गाँव में भी शहर से कोचिंग व्यवस्था
को आयातित कर लिया गया है. कमला के अलावा उसके जैसी आर्थिक स्थिति वाले किसी भी छात्र
को दसवीं पास करने का सुख नहीं मिला, जबकि प्रधान के घर का हर बच्चा सारे शिक्षकों
के विशेष ट्यूशन भी लेता और परीक्षा के समय वी.आई.पी. ट्रीटमेंट भी उपलब्ध कराये जाते.
इसके बाद उसके फेल होने की कोई संभावना नहीं रह जाती. इन सब मुद्दों पर कमला के अपने
विचार थे, अपने रुझान और बहुत सी बातों पर लंबे समय से दबी हुई खीझ. समाज शास्त्र उसके
लिए उपयुक्त विषय था. उसका बी. ए. में दाखिला कराना एक तरह से मेरा उसके लिए धन्यवाद
था.
कमला की पढाई फिर से शुरू हुए लगभग एक वर्ष बीत
चुका था. पिछले एक साल में बहुत कुछ नया नहीं हुआ. पिताजी समय समय पर शहर वापस आ जाते
और फिर गाँव चले जाते. माँ की तो पूरी जिंदगी पिताजी के चारों ओर ही सिमटी हुई थी सो
वो भी उनके साथ गाँव और शहर आती जाती रहती थीं. जब भी वे गाँव जाते, कमला उनकी सेवा
करने आ जाती थी. कमला की पढाई, अगर उसकी सुनें तो अच्छी चल रही थी, हालाकि इम्तेहान
के नतीजे इस बात की पुष्टि नहीं कर रहे थे. आजकल सिर्फ ६० प्रतिशत अंक लाने वाले छात्र
औसत माने जाते हैं. ये सोचकर, कि गाँव में रहकर इससे बेहतर कर पाना संभव नहीं हो सकता,
मैं उसके ६०% से ही संतुष्ट था. कमला के तर्क कुछ और ही थे. उसका मानना था कि ज्यादा
अंक लाने के लिए जिस तरह से पढ़ना होता है उससे कोई छात्र बहुत सारी बातें जान तो सकता
है, लेकिन कुछ भी सीख नहीं सकता. पता नहीं, मैंने तो हमेशा वैसे ही पढाई की जिससे परीक्षा
में अव्वल आता रहूँ. और देखिये, क्या कमी है मेरे पास. इतनी अच्छी कंपनी में बढ़िया
मोटी तनख्वाह वाली नौकरी, अच्छा रहन सहन, और प्यारे और सुंदर दोस्त. शहर में वापस आने
और अपने पुराने माहौल में लौटने के बाद मुझे फिर से एहसास होने लगा था कि सुन्दर चेहरे
की बात ही कुछ और होती है. माना कि ऐसे लोग भी होते हैं जो देखने में सुंदर नहीं होते
पर समझ और सूझ बूझ अच्छी रखते हैं, लेकिन फिर भी, खूबसूरती तो चेहरे से ही होती है.
चेहरे की खूबसूरती बहुत सी बातें बता सकती है किसी इंसान के बारे में. कम से कम उसके
पिछले जीवन के बारे में. अगर मेरे पिता संपन्न ना होते तो मुझे ऐसा रहन सहन नहीं मिलता.
गरीबी और कुपोषण का शिकार होकर मैं भी बदसूरत हो जाता, असुंदर हो जाता. लेकिन मेरा
भाग्य प्रबल था. नियति ने सब कुछ मेरे अनुकूल बनाया था. मेरा शरीर सुन्दर, स्वस्थ और
पुष्ट था. बीमारियाँ तो कभी मेरे पास भी नहीं फटकीं, और मुझे पूरा विश्वास था कि मुझे
भविष्य में भी किसी बीमारी का सामना नहीं करना पड़ेगा. आजकल फैली हुई ये नयी बीमारी
भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी. जी हाँ! शहर में एक नयी बीमारी ‘सार्स’ ने सबको डरा
के रखा था. लेकिन ये बीमारी, या कोई भी रोग, उनको अपना शिकार बनाता है जिनके पास सुविधाएँ
नहीं होतीं. वातानुकूलित घर और दफ्तर में रहने वालों के पास रोगाणु नहीं पहुचते. लेकिन
इस बार भी मैं गलत साबित होने वाला था . एक दिन अपने दफ्तर में बैठे हुए ऐसा महसूस
हुआ कि सुबह से शायद अपने स्टाफ पर कुछ ज्यादा ही चिल्लाया और इसके कारण गले में खरास
हो गयी है. पर शाम तक तकलीफ कुछ बढ़ गयी और लगने लगा कि कुछ तो उतना ठीक नहीं है. सब
कुछ साफ़ होने में ज्यादा समय नहीं लगा. अगली सुबह तक मेरी तबियत इतनी खराब हो गयी कि
हस्पताल जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. जांच कराने के बाद स्पष्ट हो गया कि सेलेब्रिटी
बन चुकी सार्स नाम की बीमारी ने मुझे पसंद कर लिया था. जैसे ही डॉक्टर ने सार्स की
पुष्टि की, मुझे ज़िंदगी का दूसरा झटका लगा. अब तक शहर में ये बात फ़ैल चुकी थी कि सार्स
जानलेवा बीमारी है. इसका कोई निदान नहीं है और भायाशाली लोग ही इसके चंगुल से बच पाते
हैं.
मृत्यु- बोलने और सुनने की समझ होने के थोड़े समय
बाद ही एक इंसान इस शब्द को जान लेता है. मुझे नहीं पता कब एक बच्चे को पता चलता है
कि मरने का क्या मतलब होता है. लेकिन जो भी हो, मेरी उम्र तक आते आते हर कोई जान जाता
है कि मौत क्या होती है, और अपने आस पास कई मौतें देख भी चुका होता है. ऐसे में महाभारत के युधिष्ठिर का वो जवाब बहुत सार्थक लगता है कि दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि
हर किसी को पता होता है कि जो जन्मा है उसे मरना होगा, फिर भी सब ऐसे जीते हैं
जैसे वो कभी नहीं मरेंगे. मेरे साथ भी तो कुछ ऐसा ही था. अपनी मृत्यु के बारे में तो
मैंने कभी भी नहीं सोचा था. पर अब लग रहा था कि मृत्यु सार्स की शक्ल में बिलकुल सामने
खड़ी हो गयी थी. चाह कर भी कोई उस इंसान की मनःस्थिति की कल्पना नहीं कर सकता जिसको
अपने ठीक सामने मौत खड़ी दिखाई दे रही हो. सुख और दुःख की सारी परिभाषाएं बदल जाती हैं.
कुछ भी धुंधला नहीं होता, बस काले और सफ़ेद दो हिस्से दिखते हैं जिनके बीच तलवार की
धार जैसी महीन रेखा होती है. रेखा के इस तरफ जीवन का उजाला और उस तरफ काली मौत. पद,
प्रतिष्ठा, मान, धन, दौलत, दोस्ती, दुश्मनी, सब अपने मायने खो देते हैं. सब कुछ दे
कर बस इंसान एक चीज पा लेना चाहता है, थोड़ी सी और जिंदगी.
ये तो पहले से पता था कि दोस्तों की फेहरिस्त में
स्वार्थ सिद्ध करने वालों की बहुतायत थी, पर ये कहाँ पता था कि इस बीमार को सब के
सब मरने के लिए छोड़ देंगे. लेकिन माँ बाप किसी और ही मिट्टी के बने होते हैं. मेरी
बीमारी का सुनते ही पिताजी माँ और कमला को लेकर हस्पताल आ गए. डॉक्टर ने समझाया कि
हस्पताल में किसी एक का होना ही काफी है और उन्हें रुक कर अपनी सेहत खराब नहीं करनी
चाहिए. माँ और पिताजी मेरे ऑफिस के फ्लैट में रुके और हाँ, अबतक आपने अनुमान लगा लिया
होगा, मेरी देखभाल के लिए कमला हस्पताल में रुकी. सार्स एक फ़ैलने वाली बीमारी थी इसलिए
शुरू के एक सप्ताह मुझे अलग कमरे में रखा गया था जहाँ सिर्फ वो डॉक्टर और नर्स आते
थे जिन्होंने मास्क पहने हुए होते थे. पर मैं अपने कमरे की शीशे वाली खिडकी से देख
पाता था कि कमला बाहर पूरी सजग होकर बैठी होती थी. हर बार डॉक्टर के कमरे के अंदर आने
के समय उसके माथे पे चिंता कि कुछ लकीरें उभर आती थीं जो डॉक्टर के बाहर आने तक रुकी
रहती थीं और मेरी सेहत में सुधार की खबर सुनकर एक हलकी मुस्कराहट में तब्दील होकर होठों
तक उतर आती थीं. एक सप्ताह बीतने के बाद मुझे सार्स वाइरस से मुक्त घोषित कर दिया गया.
लेकिन हस्पताल में तब तक रुकने और डॉक्टर की निगरानी में रहने की सलाह थी जब तक मैं
पूरी तरह तंदरुस्त न हो जाऊं. अब मुझे देखने और मुझसे मिलने आने वालों को इजाज़त थी
कमरे में आने की. लेकिन तब भी माँ, पिताजी और कमला के अलावा मेरे अधिकारियों के भेजे
हुए कुछ बुके ही अंदर आते थे. उन फूलों में रंग और गंध सारे औपचारिक होते थे. सौंदर्य
का उनमे अंशमात्र भी नहीं होता. उन फूलों के बनिस्पद मुझे कमला के चेहरे की तरफ देखने
में ज्यादा अच्छा महसूस होता था. ये चेहरा मेरे लिए आशा का पर्याय सा बन गया था. पिछले
एक सप्ताह में जब भी मुझे लगने लगता था कि शायद सार्स नाम की ये बीमारी मुझे अपने साथ
कहीं दूर ले जायेगी, कमला की शक्ल में मुझे एक नयी उम्मीद दिखने लगती थी. ना जाने क्यूँ,
पर अब मन ये मान लेना चाहता था कि कमला बहुत बुद्धिमान है, चतुर भी, वो सब ठीक कर सकने
की क्षमता रखती है. वो मुझे नहीं मरने देगी. और अब, जब कि मैं सार्स के चंगुल से बाहर
आ चुका था, कमला मुझे किसी वरदान जैसी लगती थी जिसने मेरी मृत्यु को जीवन में तब्दील
कर दिया था. अब मैं उन चेहरों के बारे में भी सोचता था जो कभी मेरी नज़र में सौंदर्य
की परिभाषा हुआ करते थे. उनमे से अधिकांश अब मुझे स्वार्थ की जीती जागती मिसाल लगने
लगे थे. उन चेहरों की सुंदरता के पीछे बनावट, छल और दिखावे छुपे हुए थे. ये सारे चेहरे
नकली थे. हर किसी के पास कई मुखौटे थे, और अवसर आने पर हर कोई अपना मुखौटा बदल लेता
था. आँखों की सुंदरता में वासना छुपी होती थी, नाक हर ओर बस दौलत की गंध सूंघने की
कशमकश में लगी रहती और सुन्दर होठों के पीछे नुकीले दांत छुपे होते जो कभी भी किसी
भी इंसान का खून पी सकते थे. आज एहसास हुआ कि कितनी गलत परिभाषाओं के साथ जी रहा था.
सुंदरता ईश्वर ने बनायी है,
ईश्वर ने इसको सृष्टि के हर हिस्से में छुपाया है. मैं
ईश्वर की रचना में
ईश्वर से द्वंद्व करते हुए जिए जा रहा था.
सार्स को गए हुए अब एक साल बीत चुका था. कंपनी
में मेरा ओहदा तो नहीं बदला लेकिन और बहुत सी चीजें बदल चुकी थीं. मैंने अपने हस्ताक्षर
बदल लिए थे. हाथ से खीची गयी टेढी मेढ़ी रेखाओं को सजाना और संवारना मूर्खता है, और
मूर्खता है अपने ओहदे या हैसियत पर अभिमान करना क्योंकि अहम सिर्फ अपने साथ तकलीफें
लेकर आता है, उनका समाधान नहीं. आज मैंने अपना सबसे अच्छा सूट, सबसे अच्छी टाई और सबसे
अच्छे जूते निकाले थे. ऑफिस जाने के लिए नहीं बल्कि कहीं और जाने के लिए. कमला ने अपने
कोर्स में एक प्रोजेक्ट बनाया था जिसे समाज शास्त्र के एक जाने माने शोध संस्थान की
तरफ से विशेष पुरस्कार मिला था. आज उसी संस्थान के समारोह में कमला को सम्मानित किया
जाना था और मैं अतिथि के तौर पे आमंत्रित था. संस्थान के सभागार में पहुँच कर मैं गौरवान्वित
महसूस कर रहा था. इतनी खुशी मुझे पहले कभी नहीं हुई थी. ऐसा लग रहा था जैसे ये पुरस्कार
मुझे मिल रहा हो. और इस पुरस्कार का भी अपना महत्त्व था. ये पुरस्कार किसी व्यक्ति
को नहीं मिल रहा था. ये पुरस्कार था विचारों को, जिनके दम पर कोई इंसान मरने के बाद
भी हजारों साल तक जिंदा रह सकता है. विचारों का सौंदर्य कभी मुखौटे नहीं लगाता, कभी
बूढ़ा नहीं होता, कभी मुरझाता नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी और युवा होता रहता है.
मुख्य अतिथि आ चुके थे. सम्मान के लिए कमला को
मंच पे बुलाया गया. मैंने सबसे तेज ताली बजने की कोशिश की, ये जताने के लिए कि इस पुरस्कार
वितरण समारोह का सबसे खुश और उत्साहित व्यक्ति मैं ही था. मंच पर कमला ने पुरस्कार
स्वीकार किया और फिर मुड कर मुझे दिखाते हुए थोडा सा मुस्कुराई. आज कमला के चेहरे में
कोई भद्दापन नहीं दिख रहा था मुझे. ये आँखें जीवन देने वाली थीं, और होठ आशाओं के जुगनुओं
के घर थे. मुस्कराहट में कोई अभिमान नहीं था. वहाँ संतोष था, और आत्मविश्वास. इस चेहरे
में इश्वर का सौंदर्य था. कमला असुंदर नहीं थी.
beautiful sir....really incredible writing....it was actually spellbound...plethora of emotions dignified with expression...really beautiful
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